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कूलिंग सिस्टम में क्वांटम प्रोसेसर, जो 2026 की ऊर्जा खपत और शीतलन को दर्शाता है।

ऊर्जा का संकट: एक क्वांटम कंप्यूटर कितनी बिजली 'पीता' है?

May 15, 2026By QASM Editorial

साल 2026 की शुरुआत के साथ ही, क्वांटम कंप्यूटिंग अब प्रयोगशालाओं से निकलकर डेटा सेंटरों तक पहुँच चुकी है। भारत के राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के तहत बेंगलुरु और हैदराबाद में स्थापित नए क्वांटम हब इस बात का प्रमाण हैं कि हम एक नए युग में हैं। लेकिन इस तकनीकी क्रांति के साथ एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है: 'ऊर्जा की खपत'।

क्रायोजेनिक कूलिंग: ऊर्जा का सबसे बड़ा 'शोषक'

क्वांटम कंप्यूटर की बिजली खपत का सबसे बड़ा हिस्सा खुद प्रोसेसर नहीं, बल्कि उसे ठंडा रखने वाला बुनियादी ढांचा (Infrastructure) है। अधिकांश क्वांटम सिस्टम, जैसे कि सुपरकंडक्टिंग क्वैबिट्स, को पूर्ण शून्य (लगभग -273 डिग्री सेल्सियस) के करीब तापमान पर काम करना पड़ता है।

इन प्रणालियों को 'डाइल्यूशन रेफ्रिजरेटर' की आवश्यकता होती है जो चौबीसों घंटे चलते हैं। एक औसत क्वांटम कंप्यूटर जो 1000 से अधिक क्वैबिट्स को हैंडल कर रहा है, वह लगभग 20 से 30 किलोवाट (kW) बिजली की खपत करता है। यह एक औसत भारतीय घर की मासिक बिजली खपत से कहीं अधिक है, जो सिर्फ एक मशीन को ठंडा रखने में खर्च हो जाती है।

क्लासिकल बनाम क्वांटम: क्या हम बिजली बचा रहे हैं?

यहाँ एक दिलचस्प विरोधाभास है। जहाँ एक ओर क्वांटम कंप्यूटर को चलाने के लिए भारी मात्रा में बिजली चाहिए, वहीं जटिल गणनाओं के लिए यह क्लासिकल सुपरकंप्यूटरों की तुलना में अधिक 'ऊर्जा-कुशल' साबित हो सकता है।

  • क्लासिकल सुपरकंप्यूटर: एक जटिल मॉलिक्यूलर सिमुलेशन करने के लिए इसे मेगावाट (MW) बिजली की जरूरत होती है और इसमें हफ्तों का समय लग सकता है।
  • क्वांटम कंप्यूटर: वही काम कुछ ही मिनटों में कर सकता है, जिससे कुल ऊर्जा की बचत होती है।

2026 की चुनौतियां और भविष्य की राह

भारत में, जहाँ हम 'नेट-जीरो' उत्सर्जन की ओर बढ़ रहे हैं, क्वांटम डेटा सेंटरों के लिए सौर और हरित हाइड्रोजन ऊर्जा का उपयोग अनिवार्य होता जा रहा है। शोधकर्ता अब ऐसे 'फोटोनिक' और 'ट्रैप्ड आयन' सिस्टम पर काम कर रहे हैं जिन्हें अत्यधिक कूलिंग की आवश्यकता नहीं होती।

निष्कर्ष

2026 में क्वांटम कंप्यूटर बिजली तो बहुत 'पीते' हैं, लेकिन उनकी गणना करने की क्षमता उन्हें लंबी अवधि में एक किफायती विकल्प बनाती है। चुनौती अब बिजली की मात्रा नहीं, बल्कि उस ऊर्जा को बनाने के तरीकों और कूलिंग तकनीक को और अधिक कुशल बनाने की है।

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